-डॉ प्रदीप उपाध्याय
जब भूखे पेट भजन नहीं हो सकता तब फिर खाली पेट उपवास कैसे हो सकता है।कहा भी गया है कि भूखे पेट भजन नहीं होवे गोपाला।अब लोग हैं कि छोले-भटूरे खाकर उपवास पर बैठने वालों के विरूद्ध हाथ-मुँह धोकर पीछे पड़ गये हैं।जो लोग उपवास पर बैठने वालों का उपहास कर रहे हैं, वे नादान हैं।वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं और क्यों कर रहे हैं ,शायद स्मृति लोप का शिकार हो चुके हैं वरना पहले वे भी इस दौर से गुजर चुके हैं,आज उन्हें भी यही सब करना है और आगे चलकर भी उन्हें यही सब दोहराना है ।
अब देखिये न कि वे भी एक संकल्प लेकर ही तो उपवास करने राजघाट पर महात्मा जी की समाधि पर बैठने गये थे।महात्मा जी के अस्त्र और उनका नाम लेकर हर कोई उनकी समाधि पर महात्मा हो जाता है।रामलीला मैदान भी राम की लीला की जगह महात्माओं की लीला का स्थान हो गया है! अभी भरे पेट का इनका उपवास दलित उत्पीड़न के विरोध में था और उनका खाली पेट या भरे पेट उपवास संसद की कार्यवाही बाधित करने के विरोध में होगा!
उपवास किसी बात के विरोध में क्यों किया जाता है, यह अभी समझ के परे है।कई लोग तो कहते भी हैं कि उपवास या व्रत करने से स्वयं के मन और शरीर को कष्ट पहुँचता है लेकिन ईश्वर प्रसन्न हो जाता है।ये लोग भी उपवास पर बैठते हैं तो इनका लक्ष्य ईश्वर को प्रसन्न करना तो हो नहीं सकता!यदि वास्तव में ऐसा होता तो ये सत्ता के गलियारों को छोड़कर हिमालय की कन्दराओं में धुनी रमा रहे होते!
माना तो यही जाता है कि व्रत-उपवास ईश्वर की विशेष कृपा प्राप्त करने के लिए किए जाते हैं।वैसे धर्म भीरू लोग कहते भी हैं कि इनके सम्बन्ध में कुछ खास नियम भी बताये गए हैं जिनका पालन न करने पर उपवास का फल भी नहीं मिलता है।साथ ही जीवन में परेशानियाँ भी बढ़ जाती हैं तथापि ये लोग तो निडर हैं।ये ऐसी तुच्छ मानसिकता की बातों से डरते भी नहीं और इसीलिए जैसा चाहें वैसा व्रत-उपवास करने बैठ जाते हैं!
खैर,आखिर उपवास क्यों किया जाता है, कभी सोचा है आपने!नही न!यदि खाली पेट रखना ही उपवास होता तो जिन्हें दो जून रोटी भी नसीब नहीं और फा़के के साथ जो भूखे पेट निन्दिया रानी की गोद में सोने को मजबूर हैं उन्हें तो मोक्ष और स्वर्गलोक की एन्ट्री वैसे ही मिल जाना चाहिए लेकिन ऐसा है नहीं।यह खेल भरे पेट वालों के लिए ही है।और वे ही उपवास कर सकते हैं।उपवास का मतलब ही है उप+वास यानी ईश्वर अथवा अपने इष्ट देव के समीप बैठना ।तब तो ये लोग जो कर रहे हैं,वह ठीक ही तो है!इनका ईश्वर भी मतदाता है,इनका इष्टदेव भी मतदाता है और मतदाता कभी इनसे पूछता भी नहीं है कि भाई,तुम पेट भरकर उपवास पर बैठ रहे हो या खाली पेट! ऐसी स्थिति में किसी को विरोध या शिकायत करने का अधिकार भी नहीं है।जिसको जैसा ठीक लगे उपवास-उपवास खेले और अपने मतदाता का सामीप्य हांसिल करे।मतदाता खुश तो कृपा बरसते देर कहाँ लगेगी।

१६,अम्बिका भवन,बाबूजी की कोठी,उपाध्याय नगर,मेंढकी रोड़,देवास,म.प्र.
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