-विनोद कुमार विक्की (स्वतंत्र लेखक सह व्यंग्यकार)


जी हाँ सही सुना आपने।चीन -पाक के विरोध के कारण भले ही भारत एनएसजी ग्रुप में शामिल नहीं हो पाया लेकिन देशवासियों के लिए यह गुड न्यूज़ है कि भारत को जल्द ही पीएसजी ग्रुप अर्थात 'पकौड़ा सप्लायर ग्रुप' में प्रवेश की स्वीकृति मिलने वाली है।
इसकी पुष्टि कुछ दिनों पूर्व राज्यसभा में सत्तारूढ़ पार्टी के कर्ताधर्ता सर्वश्री के विवादास्पद बयान से मिला है।
सबसे सुखद बात ये है कि भारत के पीएसजी ग्रुप में शामिल होने पर ना तो चीन को आपत्ति है और ना पाकिस्तान को।
उत्तरकोरिया,बंगलादेश,पाकिस्तान आदि भारत से पकौड़ा के राॅ मैटेरियल सहित रेडीमेड पकौड़ा के बड़ी खेप मंगाने के लिए तैयार भी है।
पार्टी के कार्यकर्ताओं में पकौड़ा निर्यात को लेकर एक ओर जहाँ उत्साह देखने को मिल रहा है वहीं अच्छे दिन की आस लगाए शिक्षित युवा एवं परीक्षा उम्र सीमा के बार्डर पर खड़े बुढा हो रहे बेरोजगारों को
इस कथन से कैरियर बनाने का भरपूर अवसर दिखाई दे रहा है।
गौरतलब है कि काम के लिए प्रतिबद्ध वर्तमान सरकार ने इसकी पहल भी कर दी है।इसके तर्ज पर ही यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन (यूपीएससी) को यूनियन पकौड़ा सर्विस कमीशन(यूपीएससी) बनाने पर पूरी तरह आमदा है।
यकिन ना हो तो खुद देख लें। रविश भैया के अनुसार वर्ष 2014 में यूपीएससी की 1299 सीटों की रिक्तियां आई थी।2015 में ये रिक्तियां 1129 हो गई। 2016 में 1079 हुई 2017 में 980 जबकि इस वर्ष 2018 में महज 782 सीटों के अवरोही क्रम में पहुँच गई है।
वर्ष 2014 की तुलना में रिक्तियां प्रति वर्ष घटते-घटते महज 60% रह गई है।
यह इस बात का साफ संकेत दे रहा है कि आने वाले समय में यदि इनकी सरकार फिर बनीं तो ना रहेगी रिक्तियां और ना होगी नियुक्तियां फिर तो युवा बेरोजगारों की बल्ले बल्ले।ना किसी के अंडर नौकरी करनी होगी और ना होगा कोई बाॅस।खुद की पकौड़े की रेहड़ी और दुकान होगी जहाँ के आल इन वन वे खुद होगें।
साढ़े तीन वर्षों में एकमात्र बड़ी भैकेंसी रेलवे की आई थी जिसकी चयन प्रक्रिया अभी भी चल ही रही है।
यदि भारत पीएसजी ग्रुप में शामिल होता है तो निःसंदेह पकौड़े का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य बिहार होगा।
यहाँ बिहार पकौड़ा सर्विस कमीशन(बीपीएससी) एवं बिहार सैंडविच शाॅश कमीशन(बीएसएससी) पहले से ही विधमान है।ये दोनों आयोग कर्मचारी चयन के " रिक्तियां कम प्रक्रिया विलम्ब" वाली नीति के लिए पहले से ही वर्ल्ड फेमस है।
56-59वीं की बीपीएससी वैकेंसी हो या बीएसएससी की 2014 वाली सचिवालय सहायक की वैकेंसी तीन साल बाद भी प्रोसेस में है।यहाँ पर नियोजन की प्रक्रिया भीम-जरासंध के युद्ध की तरह लंबा खिंचाता है।
हाँलाकि आयोग की इस प्रक्रिया से गठबंधन वाली बिहार सरकार के दहेज विरोधी मुहिम को काफी फायदा है।भैया जब नौकरी ही ना मिलेगी तो दहेज़ तो मिलने से रहा।
बक्सर एवं आरा में रोजगार मांगने के लिए बेरोजगार लाख धरना-प्रदर्शन करें या बीपीएससी/बीएसएससी के परीक्षा परिणाम का इंतजार करने वाले उम्मीदवार आयोग के सामने पेटकूनिया पाड़े लेकिन साहब की पकौड़ा तलने व बेचने वाली नसीहत वर्तमान परिप्रेक्ष्य में साढ़े सोलह आना सच प्रतीत होता है।

महेशखूंट बाजार जिला-खगडिय़ा (बिहार)
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