-बाल मुकुंद ओझा (वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार)


व्यंग्य विषंगति, झूठ और पाखंड का भड़ाफोड़ कर सत्य का साक्षात् कराता है। व्यंग्य फब्तियां कसती हैं जो हंसाती,गुदगुदाती और तिलमिलाती हैं। सियासत में अब व्यंग्य की भाषा भी कुंठित होने लगी है। व्यंग्य उपहास, मजाक और ताने का मिलाजुला स्वरुप है। राजनीति ने साहित्य की इस विधा को इस तरह निचोड़ा है कि व्यंग्य भी नेताओं के आगे शर्माने लगा है। राजनीति के सियासी बोलों ने व्यंग्य विधा का इस प्रकार दुरूपयोग किया है कि यह विधा बियाबान में खो गई है और इनका स्थान गंदे और नफरत भरे बोलो ने ले लिया है।
कहते है राजनीति के हमाम में सब नंगे है। यहाँ तक तो ठीक है मगर यह नंगापन हमाम से निकलकर बाजार में आजाये तो फिर भगवान ही मालिक है। सियासत में विवादास्पद बयान को नेता भले अपने पॉपुलर होने का जरिया मानें, लेकिन ऐसे बयान राजनीति की स्वस्थ परंपरा के लिए ठीक नहीं होते। हमारे माननीय नेता आजकल अक्सर ऐसी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे हमारा सिर शर्म से झुक जाता है। देश के नामी-गिरामी नेता और मंत्री भी मौके-बेमौके कुछ न कुछ ऐसा बोल ही देते हैं, जिसे सुनकर कान बंद करने का जी करता है।
कहते है राजनीति के हमाम में सब नंगे है। यहाँ तक तो ठीक है मगर यह नंगापन हमाम से निकलकर बाजार में आजाये तो फिर भगवान ही मालिक है। सियासत में विवादास्पद बयान को नेता भले अपने पॉपुलर होने का जरिया मानें, लेकिन ऐसे बयान राजनीति की स्वस्थ परंपरा के लिए ठीक नहीं होते। हमारे माननीय नेता आजकल अक्सर ऐसी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे हमारा सिर शर्म से झुक जाता है। देश के नामी-गिरामी नेता और मंत्री भी मौके-बेमौके कुछ न कुछ ऐसा बोल ही देते हैं, जिसे सुनकर कान बंद करने का जी करता है।
ताजा विवाद पूर्व सांसद और अदाकारा जयप्रदा और पूर्व मंत्री आजम खान के सामने आये है। जयप्रदा ने आजम को खिलजी बताया तो आजम ने जयप्रदा को नाचने वाली।
प्रधानमंत्री मोदी और कांग्रेस के पूर्व और वर्तमान अध्यक्ष के बीच सियासी गंदे बोल इतने निम्न स्तर पर चले गए की हमारी लोकतान्त्रिक परम्पराएं ध्वस्त होने लगी। शुरुआत में मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब उन्हें मौत का सौदागर कहा गया। फिर तो व्यंग्य बाणों की बौछारे होने लगी। ये बाण लोकतान्त्रिक नहीं थे। इनमें गंदगी की बू आरही थी। इस समय भारतीय राजनीति में मर्यादा ,विवेक, परम्परा, बंधुत्व तथा सद्भावना को तिलांजलि देने का कुत्सित प्रयास हो रहा है।
राजनीति में पिछले एक दशक से गंदे और विवादित बोल बोले जा रहे है। बिहार चुनाव में मोदी को राक्षस और नर पिशाच तक कहा गया। यूपी चुनाव में भी इसकी पुनरावृति हुई। देश में कई नेता अपने विवादित बयानों के लिए सुर्खियों में रहे है। इनमें दिग्गी राजा, लालू और उसके बेटे, मणिशंकर अय्यर, केजरीवाल ,गिरिराज सिंह , आजम खान ,असदुद्द्दीन ओवैसी फारुख अब्दुला, मायावती और ममता प्रमुख है जिनके बयानों से गाहे बगाहे राजनीति की मर्यादाएं भंग होती रहती है।
नफरत की आग को हवा देने में हमारे टीवी चैनल भी किसी से पीछे नहीं है। चैनलों पर हो रही बहस देश को आईना दिखाने में काफी है। राजनितिक दलों के नुमाइंदों की स्तरहीन बहस सुनकर कई बार सिर शर्म से झुक जाते है। एक बार मेरे दसवीं में पढ़ने वाले बच्चे ने मुझसे पूछा पापा ये इतने भयानकढंग से लड़ क्यों रहे है। मेरे से कोई जवाब देते नहीं बना। इन नफरत भरे मस्करी बोलों की आग देखते देखते पूरे देश में फेल जाती है और छटभैये नेता इसी अंदाज में लड़ाई झगडे पर उतर आते है।

 

 


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