-बाल मुकुंद ओझा (वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार)

भारत में नवजात शिशुओं की मौतों का आंकड़ा दिल दहलाने वाला है। स्वाभाविक कारणों के अलावा चिकित्साकर्मियों की लापरवाही भी इन मौतों के पीछे बड़ा कारण बताई जा रही है। भारत सरकार के अनुसार देश में हर साल होने वाली नवजात मौतों का आंकड़ा 12.6 लाख के पार पहुंच गया है। इनमें से 57 प्रतिशत नवजात अपने जन्म के 28 दिनों के भीतर ही दम तोड़ देते हैं. मौत की वजहों में समय से पूर्व जन्म, इन्फेक्शन और जन्माघात शामिल है।
देश में वर्ष 2008 से 15 के बीच हर घंटे औसतन 89 नवजात शिशुओं की मृत्यु होती रही है। 62.40 लाख नवजात शिशुओं की मृत्यु जन्म के 28 दिनों के भीतर हुई। यूनिसेफ, विश्व बैंक और विश्व स्वास्थ्य संगठन की संयुक्त रिपोर्ट के मुताबिक 2016 में दुनिया भर में मरने वाले कुल नवजात शिशुओं में 24 फीसदी भारत से थे। चैंकाने वाला तथ्य यह है कि इनमें से 62.40 लाख बच्चे जन्म के पहले महीने (नवजात शिशु मृत्यु यानी जन्म के 28 दिन के भीतर होने वाली मृत्यु) में ही मृत्यु को प्राप्त हो गए।
इन रिपोर्टों के अनुसार पांच साल से कम उम्र के बच्चों की कुल मौतों में से 56 प्रतिशत बच्चों की नवजात अवस्था में ही मृत्यु हो गई। इसे हम 5 साल से कम उम्र में होने वाली बाल मौतों में नवजात शिशुओं की मृत्यु का हिस्सा कह सकते हैं। ग्लोबल ब्रेस्ट फीडिंग स्कोरकार्ड के मुताबिक बच्चों को मां का दूध नहीं मिलने के कारण भारत की अर्थव्यवस्था को 9000 करोड़ रुपये का नुकसान होता है। जब बच्चों को स्तनपान नहीं मिलता है तो लगभग 1 लाख बच्चों की इससे जुड़े कारणों से मौत हो जाती है। इस अवधि में उत्तर प्रदेश में 16.84 लाख नवजात शिशुओं की मृत्यु हुई। राजस्थान में इन आठ सालों में 5.12 लाख, बिहार में 6.54 लाख, झारखंड में 1.70 लाख, महाराष्ट्र में 2.92 लाख, आन्ध्र प्रदेश में 3.35 लाख, गुजरात में 2.95 लाख नवजात शिशुओं की मृत्यु हुई।
देश में नवजात शिशुओं की मौत पर हाहाकार मचा हुआ है। यह रिपोर्ट केवल एक अस्पताल या राज्य की नहीं है अपितु विभिन्न राज्यों से मिली है। मौत के अलग अलग कारण बताये जा रहे हैं। कहीं ऑक्सीजन की कमी तो कहीं लापरवाही तो कहीं कुपोषण को जिम्मेदार बताया जा रहा है। देश में शिशुओं के स्वास्थ्य की देखभाल की दशा बेहद चिंताजनक है। भारत में हर साल लाखों बच्चे ऐसी बीमारियों के चलते मौत के मुंह में जा रहे हैं, जो निदानयोग्य हैं यानी जिनका इलाज मुमकिन है। हमारे देश में सरकारें नवजात शिशुओं को स्वास्थ्य सुरक्षा दे पाने में नाकामयाब और लापरवाह साबित हो रही हैं।
रिपोर्ट के अनुसार सरकार ने राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन और तथा एनआरएचएम कार्यक्रम के तहत इस दिशा में सशक्त पहल जरूर की है जिसमें यूनीसेफ भी सहयोगी की भूमिका में है लेकिन इस प्रयास में जितने आर्थिक संसाधनों की दरकार है वे पर्याप्त नहीं है इसके लिए जनभागीदारी को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। यूनीसेफ का कहना है कि शिशुओं की अकाल मौत के ज्यादातर मामले निम्न आय वर्ग के परिवारों में होते हैं जहां कुपोषण ,शारीरिक दोष और मलिन वातावरण की समस्या बच्चे के जन्म से पहले ही मौजूद रहती है। ऐसे में अकेले सरकार के लिए इन स्थितियों को सुधारना मुमकिन नहीं है, इसके लिए समाज के हर जिम्मेदार व्यक्ति को सहयोगी की भूमिका में आना होगा।
‘सेव द चिल्ड्रन’ की रिपोर्ट के अनुसार, दो तिहाई से अधिक नवजात शिशुओं की मृत्यु पहले महीने में ही हो गई। इनमें से 90 फीसदी मृत्यु निमोनिया और डायरिया जैसे बीमारियों से हुई जिनका इलाज आसानी से हो सकता था। वर्तमान में नवजात बच्चों की मृत्यु दर 48 (प्रति 1,000) है, जबकि वर्ष 2015 में यह 43 थी। यूनिसेफ की रिपोर्ट का अनुमान है कि यदि सरकारों ने अपना रवैया नहीं बदला, तो साल 2030 तक दुनिया में उपचार योग्य बीमारियों के चलते 6.9 करोड़ बच्चों की मौत पांच साल से कम उम्र में ही हो सकती है
स्वास्थ्य विभाग के वार्षिक सर्वेक्षण के अनुसार मां को उचित पोषण न मिलने के कारण बच्चे कमजोर पैदा हो रहे हैं। जन्म के समय बच्चे अपने औसत वजन से बहुत कम के पैदा होते हैं। विभन्न सरकारी और गैर सरकारी स्वास्थ्य सर्वेक्षणों में रेखांकित किया गया है कि शिशु मृत्यु और प्रसव काल में माताओं की मृत्यु के कारण ऐसे हैं, जिन्हें रोका जा सकता है।
देश में स्वास्थ्य सेवाओं को गांव गुवाड़ तक पहुंचाकर हर नागरिक को समय पर सम्यक चिकित्सा सुविधा की व्यवस्था करनी होगी । साथ ही सरकारी सुविधाएँ बिना भेदभाव और लाग लपेट के हर माता तक पहुँचाने के लिए सरकार और समाज को मिलजुल कर प्रयास करने होंगे। कुपोषण पर नियंत्रण कर गरीब और जरूरतमंद गर्भवती माता को पौष्टिक आहार सुलभ करने की दिशा में तेजी से प्रयास करने होंगे तभी नवजात शिशुओं की मृत्यु पर रोक लगाई जा सकती है।

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