-डा. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा


भावी को नहीं समझने का ही परिणाम है कि आने वाले 75 दिनों में दक्षिण अफ्रीका की राजधानी केपटाउन जलविहीन हो जाएगी। केपटाउन में केवल और केवल मात्र दैनिक उपभोग के लिए 75 दिन का पानी ही बचा है। इसके लिए अकेले सूखे को दोष नहीं दिया जा सकता। समय रहते कदम नहीं उठाना, जनसंख्या का दबाव, उपलब्ध पानी का दुरुपयोग, अत्यधिक जलदोहन, रिसाइक्लिंग का अभाव, जल प्रदुषण और ना जाने कितने ही ऐसे कारण है जो इसके लिए जिम्मेदार है। आखिर प्राकृतिक संसाधनों को अंधाधुंध उपयोग करते रहेंगे तो यही होना है। वैसे भी यह साफ हो चुका है कि तीसरा विश्वयुद्ध होता है तो वह पानी के लिए होगा। केपटाउन तो एक उदाहरण मात्र है। मानवीय उपयोग के जल का संकट तो अब विश्वव्यापी होता जा रहा है। 2015 में साओ पाउलो इस संकट से गुजर चुका है। आस्ट्र्ेलिया के मेलबोर्न, पर्थ, एडिलेड व सिडनी जल संकट का सामना कर चुके हैं। यमन, लीबिया और जार्डन आज भी जल संकट से गुजर रहे हैं। मालदीव जल संकट का सामना कर चुका है और भारत को मालदीव में पीने योग्य पानी भेजना पड़ा था, इसे भुलाया नहीं जा सकता। हमारे देश में ही जल स्तर में निरंतर गिरावट के साथ ही कई जगहें ऐसी है जहां दो से तीन दिन में पानी की सप्लाई होती है। 2025 तक भारत में भी जल संकट की स्थितियां उत्पन्न होने की चेतावनी वैज्ञानिक दे चुके हैं। यह गिनाए गए देशों या स्थानों की समस्या ही नहीं हैं बल्कि दुनिया के अधिकांश देश जल संकट से जूझ रहे हैं या आने वाले सालों में समय रहते बदलाव नहीं किया तो जल संकट से दूर भी नहीं है। मजे की बात यह है कि जल संकट के लिए केवल और केवल मात्र प्रकृति यानी की अनावृष्टि को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। केवल सरकारों को भी कोसा नहीं जा सकता। हांलाकि सरकारे एक मायने में समय रहते कदम नहीं उठाने के कारण जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। मजे की बात यह है कि जल के अपव्यय के लिए सभी दोषी है। जिस तरह से यह कहा जाता है कि बिजली की बचत ही बिजली का उत्पादन है उसी तरह से पानी की बचत पर जोर दिया जाना होगा। हांलाकि सरकारों द्वारा पानी की बचत पर जोर दिया जाता रहा है।
पानी की एक-एक बूंद को सहेजने का नारा बुलंद करने के बावजूद पानी की बर्बादी में हमारे शहर दुनिया के देशों के शहरों से बहुत आगे हैं। आईएसईसी के अध्ययन के अनुसार दुनिया के देशों का पानी की बर्बादी का आंकड़ा जहां एक और 15 से 20 फीसदी पर है वहीं हमारे देश में कोलकता में यह आंकड़ा 50 फीसदी को छू रहा है। मजे की बात यह है कि पानी की बर्बादी गांवों की जगह शहरों और शहरों में भी जहां पढ़े लिखे लोग अधिक है वहां हो रही है। कोलकता से थोड़ी कम 48 फीसदी पानी की बर्बादी बेंगलुरु में हो रही है तो दिल्ली में 26, चैन्नई में 18 फीसदी है। सबसे निराशाजनक यह है कि जिस वर्ग को समाज में सुधार और बदलाव की जिम्मेदारी है वहीं वर्ग यानी की अच्छा पढ़ा लिखा तबका और अपने आप को आधुनिक, सुसंस्कृत, टेक्नोक्रेट कहने वाला तबका ही इस तरह की लापरवाही करने में आगे है। दुनिया के जल विशेषज्ञों ने चेतावनी दे दी है कि 2025 तक भारत में भीषण जल संकट की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार ने वर्ष 2015-16 को जल क्रान्ति वर्ष के रुप में मनाने का निर्णय कर आमजन को पानी की बूंद-बूंद को बचाने और सहेजने के लिए जागरुक करने का कदम उठाया। इसी में से एक प्रयास जल ग्राम योजना की शुरुआत कर सरकार ने पानी के प्रति गंभीरता को स्पष्ट भी किया। जल ग्राम योजना में देश के 672 जिलों में प्रत्येक जिले के सबसे अधिक पानी की समस्या से जूझ रहे गांव का चयन कर उसे जल ग्राम घोषित करने का निर्णय किया गया। योजना यह है कि पानी की बचत, जल संग्रहण, आवश्यकता के अनुसार ही जल दोहन, कम पानी का अधिकतम उपयोग, पानी की रिसाइक्लिंग आदि उपायों से पानी की बचत के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। सपना तो यह भी रहा कि चयनित जल ग्राम आने वाले समय में अतिरिक्त पानी का संरक्षण करने की स्थिति में आ जाए। राजस्थान में जल स्वावलंबन अभियान के दो चरण लगभग पूरे कर लिए गए हैं, वहीं तीसरे चरण की तैयारियां आरंभ होने जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अब कभी भी यदि विश्वयुद्ध की संभावना बनती है तो वह पानी के लिए होगा। दुनिया के देशों में जल संकट ने अपने तेवर दिखाने शुरु कर दिए हैं। पीने के पानी का सर्वाधिक संकट होता जा रहा है। पर्यावरण प्रदुषण के चलते मौसम में बदलाव आ रहा है। आबादी के दबाव और अनियोजित विकास का असर जल स्रोतों पर पड़ रहा है। परंपरागत जल स्रोतों के रखरखाब का अभाव और प्रदुषण के चलते पानी का संकट और अधिक भयावह होता जा रहा है। ताल तलैयों का अस्तित्व समाप्त होता जा रहा है। मौसम चक्र बदल रहा है। मानसून की बेरुखी, बेमौसम बरसात, ओलावृष्टि, तूफान और असामयिक बर्फवारी आम होते जा रहे हैं। ग्लेसियरों के पिघलने की गति तेज होती जा रही है। ऐसे में पानी की बूंद-बूंद को सहेजना समय की मांग है।
दुनिया का छोटा सा देश इजरायल दुनिया के सामने मिसाल है। आंशिक भूमध्य सागरीय और आंशिक रेगिस्तानी पृष्ठभूमि के इजरायल के सामने फिलीस्तीनी व अन्य समस्याओं से जूझने के साथ ही पानी भी बड़ी चुनौती थी। योजनावद्ध प्रयासों से आज इजरायल में पानी की कमी नहीं है। खेती भी खूब हो रही है। अतिरिक्त कृषि उत्पादों का विदेशों में निर्यात हो रहा है। बागवानी के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम हुआ है। यह सब पानी के वैज्ञानिक संरक्षण से संभव हो पाया है। हांलाकि इजरायल ने पानी के सदुपयोग की तकनीक को अपनाया पर जल संकट से मुक्ति का सबसे बड़ा कारण पानी का रिसाइक्लिंग रहा है। इजरायल खेती के लिए पानी को रिसाइकिल करने वालों में दुनिया में सबसे शीर्ष पर है। स्पेन में 17 प्रतिशत पानी रिसाइकिल होता है वहीं अमेरिका में यह आंकड़ा करीब एक प्रतिशत ही है। अमेरिका में तो पानी का प्रति व्यक्ति उपभोग भी अधिक 302 से 378 लीटर प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन है जबकि केपटाउन में 50 लीटर की सीलिंग लगाते हुए इसी में सब कुछ कार्य निपटाने को कहा गया है। इजरायल ने पानी की जरुरतों को पूरा करने के लिए समग्र प्रयास किए। घरों में जाकर वाटर शैडस और टेप्स पर ऐसे उपकरण लगाए गए जिससे उनमें हबा का प्रवाह अधिक हो जाता है इससे 30 प्रतिशत तक पानी की बचत की संभावना जताई जा रही है। पानी की टैरिफ व्यवस्था को भी दो भागों में बांटा गया, जिससे एक सीमा तक उपयोग करने वालों को अनुदानित दरों पर और अधिक पानी उपयोग करने वालों को अधिक दरों पर पानी उपलब्ध कराया जाता है।
मजे की बात यह है कि पढ़े लिखे लोग ही पानी की कीमत नहीं समझेंगे तो फिर क्या किया जा सकता है। पानी का गिरता जल स्तर और पीने के पानी की कमी से रुबरु होने के बावजूद यदि हम नहीं संभलते हैं तो फिर क्या किया जा सकता हैं ? शहरों के स्थानीय निकायों व जल आपूर्ति संस्थाओं को भी गंभीर प्रयास करने होंगे तभी पानी की बर्बादी को रोका जा सकेगा। केवल नारों का हस्र तो बड़े शहरों के पानी की बर्बादी के आंकड़ों से स्वतः स्पष्ट हो जाता हैं। अब नगर नियोजकों को भी इस और ध्यान देना होगा। नई काॅलोनिया विकसित करते समय परंपरागत जल स्रोतों को बचाना होगा। जल संग्रहण की व्यवस्था करनी होगी। दम तोड़ चुकी वाटर हार्वेस्टिंग व्यवस्था को ईमानदारी से लागू करना होगा। उपलब्ध पानी की एक-एक बूंद का सही उपयोग, रिसाइक्लिंग और जल संरक्षण, जल संग्रहण के माध्यम से ही इस समस्या से निपटा जा सकता है। इसके लिए सरकार के साथ ही जनभागीदारी पहली शर्त है।

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