-बाल मुकुंद ओझा (वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार)


उत्तर प्रदेश में अखिलेश बिहार में तेजस्वी यादव, कर्नाटक में कुमार स्वामी, बिहार में चिराग पासवान, पंजाब में बादल, हरियाणा में चैटाला, कश्मीर में अब्दुल्ला, महाराष्ट्र में ठाकरे और सुप्रिय सुले के बाद अब राहुल गाँधी के कांग्रेस अध्यक्ष पद पर निर्वाचित होने के बाद एक बार फिर देश में वंश और परिवारवाद की सियासत गरमा गई है। मोतीलाल नेहरू से राहुल गाँधी तक कांग्रेस नेहरू- गाँधी परिवार के कब्जे में रही है। मोतीलाल ,जवाहर लाल, इंदिरा गाँधी ,राजीव गाँधी ,सोनिया गाँधी और अब राहुल गाँधी ने देश की सबसे पुरानी पार्टी का नेतृत्व किया है। नेहरू -गाँधी परिवार जब जब कांग्रेस पर सवार हुआ है तब तब यह पार्टी आगे बढ़ी है। नरसिंह राव, सीताराम केसरी का कार्यकाल भी लोगों ने देखा है। कहा जाता है की इन दोनों नेताओं के समय पार्टी की लुटिया डूबी जो अब तक उभर नहीं पाई है। कांग्रेस पर परिवारवाद का आरोप कोई नया नहीं है मगर यह सच है की इस पार्टी को जीवनदान यह परिवार ही दे सकता है अन्यथा स्वतंत्रता के गर्भ से निकली पार्टी को बिखरने में देर नहीं लगेगी।
आजादी के बाद कांग्रेस को अनेकों जंझावतों का सामना करना पड़ा। पहले समाजवादी बाहर निकले। फिर इंडिकेट सिंडिकेट का झगड़ा सामने आया। शरद पंवार के अलग होने के बाद कांग्रेस का नेतृत्व पूरी तरह सोनिया के हाथों में आगया। सोनिया के बाद अब राहुल ने कांग्रेस की कमान संभाल ली है। लगता है अगले 30-40 वर्षों तक राहुल कांग्रेस का नेतृत्व संभालेंगे। अब इसे आप परिवारवाद भी कह सकते है मगर इसका कोई विकल्प नहीं है।
परिवारवाद केवल कांग्रेस में ही नहीं है अपितु देश की लगभग सभी पार्टिया. परिवारवाद की शिकार है। मुलायम और अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी ,लालू और राबड़ी की आरजेडी ,शरद पंवार की एनसीपी, देवेगौड़ा की जनता दल धरम निरपेक्ष, रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी, ठाकरे परिवार कश्मीर में अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार, पंजाब में बादल परिवार, हरियाणा में हुड्डा और चैटाला परिवार, करुनानिधि परिवार आदि पार्टिया. पूरी तरह परिवार के मोह में फंसी है। भाजपा सहित अन्य पार्टियों में भी अनेक नेताओं के परिवार राजनीति में सक्रीय है। वामपंथी पार्टियां अवश्य इस रोग से दूर है।
हमारे देश की राजनीति में परिवारवाद बढ़ता ही जा रहा है। अधिकांश राजनीतिक दलों के मुखिया ने प्रमुख पदों पर अपने परिवार के सदस्यों को ही विराजमान कर दिया है। जितनी तेजी से राजनीतिक दलों में परिवारवाद पांव पसार रहा है, वह दिन दूर नहीं जब शायद कोई आम आदमी चुनाव लड़ सके। देश में बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों में एक-दो को छोडकर बाकी सभी एक विशेष परिवार तक सिमट कर रह गई हैं। कहा जाता है की इंसान अपने जन्म से नहीं कर्म से जाना जाता है,ये हम सब जानते है. आज नेता अपने खानदान से ज्यादा जाने जाते है अपने कर्मो और योग्यता के लिए कम जाने जाते है.
राष्ट्रीय राजनीति में गाँधी परिवार है, कश्मीर में अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार, पंजाब में बादल परिवार, हरियाणा में हुड्डा और चैटाला परिवार, दिल्ली में शीला दीक्षित का परिवार, और बिहार में मुलायम और लालू यादव का खानदान, मध्य प्रदेश में सिंधिया परिवार, महाराष्ट्र में ठाकरे , पवार और देशमुख परिवार, आंध्र में चन्द्रबाबु, चन्द्र शेखर राव और रेड्डी का परिवार, कर्णाटक में देवगौड़ा परिवार और तमिलनाडु में करूणानिधि का परिवार । दक्षिण की बात करें तो लोकसभा में कांग्रेस के नेता खड़गे का परिवार ,मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का परिवार मूपनार का परिवार। वंशवाद केवल बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों में नहीं है, छोटी बड़ी क्षेत्रीय पार्टियों में भी कुछ परिवारों का अच्छा खासा वजूद है. -महाराष्ट्र में ठाकरे परिवार का भी हाल राजनीति में कुछ ऐसा ही रहा है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायमसिंह के परिवार के लगभग बीस छोटे बड़े सदस्य कुर्सियों पर विराजमान हैं। पंजाब में अकाली दल के प्रकाशसिंह बादल के एक दर्जन पारिवारिक लोग कुर्सियों पर काबिज हैं। हरियाणा में स्वर्गीय देवीलाल के पुत्र चैटाला जी और उनके बेटे राजनीति में हैं। कश्मीर में स्व. शेख अब्दुला के बाद उनके बेटे फारूख अब्दुला और उनके भी बेटे उमर अब्दुला है। कश्मीर में ही विरोधी नेता महबूबा मुफ्ती अपने पिता भूतपूर्व केन्द्रीय गृह मन्त्री की विरासत की मालकिन हैं। हिमांचल के भारतीय जनता पार्टी के पूर्व मुख्यमंत्री के पुत्र अनुराग ठाकुर राष्ट्रीय युवा मोर्चा संभाल रहे हैं। हरियाणा के दो भूतपूर्व बड़े नेता चैधरी बंशीलाल व भजनलाल के वंशज राजनीति में सक्रिय हैं। बिहार के राजद के बड़े नेता लालू प्रसाद ने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को चूल्हे से सीधे मुख्यमन्त्री बनाया था। स्वर्गीय लालबहादुर शास्त्री जी के पुत्र, गोविन्दवल्लभ पन्त के पुत्र-पौत्र, मध्यप्रदेश के शुक्ला बन्धु अपने पिता की विरासत को लंबे समय तक संभालते रहे। चैधरी चरणसिंह के पुत्र एवं पौत्र उनके बताए मार्ग पर चल रहे हैं। मध्यप्रदेश के राज घराने वाले सिंधिया परिवार की पीढ़ियां राजनीति की अग्रिम पंक्ति में सक्रिय हैं। दक्षिण में तमिलनाडू में करुनानिधि पुत्र एवं पुत्री, भतीजे व अन्य रिश्तेदारों के साथ राजनीति का सुख ले रहे हैं। केरल में स्वर्गीय करुणाकरण ने पुत्र मोह में बहुत खेल किया, और पार्टी से विद्रोह किया। कर्नाटक में देवेगौड़ा के बेटे का मुख्यमंत्री बनना और हटाया जाना ज्यादा पुराना मामला नहीं है। आंध्र में ही पूर्व मुख्यमन्त्री राजशेखर रेड्डी के पुत्र जगन के हक की लड़ाई केवल कुर्सियों के लिए चली है। झारखंड में शिबूसोरेन का व उनके बेटे का राजनीतिक दांवपेंच सिर्फ कुर्सी के लिए चलता रहा है। एनसीपी नेता शरद पवार की बेटी राज्यसभा में और भतीजा राज्य में प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। इस प्रकार के कई राजनीतिकों के बेटे, भतीजे और भाई अपने बाप या दादा की वसीयत को सम्हाले हुए हैं। शीला दीक्षित, हरीश रावत, यशपाल आर्य, भूपेंद्रसिंह हुड्डा, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमन्त्री कल्याणसिंह, इन सबके बेटे भी इसी राह पर हैं।
भारत का लोकतंत्र भी अजब निराला है। पल में तोला पल में मासा की राजनीति सर्वत्र हावी है। मतदाता चाह कर भी जाति और क्षेत्र की राजनीति के भंवर से आजादी के 71 वर्षों के बाद भी निकल नहीं पाए है। लोकतंत्र ने आज पूरी तरह परिवारतंत्र का जामा पहन लिया है। बड़े बड़े आदर्शों की बात करने वाले नेता परिवारमुखी होगये है। देश वंशवाद से कब मुक्त होगा यह बताने वाला कोई नहीं है।

 


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