अपूर्व बाजपेयी (युवा स्तम्भकार)


एक उच्च शिक्षा प्राप्त प्रोफ़ेसर बेटे ने अभी कुछ दिन पहले अपनी 64
वर्षीय बीमार माँ को चौथी मंजिल से नीचे फेंक दिया, एक अन्य मामले में एक
बेटी ने अपने 90 साल के पिता व् 80 साल की माँ को घर से निकाल दिया, इस
हकीक़त के मूल में हमारी शिक्षा व्यवस्था है जिसकी तरफ बहुत पहले
प्रेमचंद्र ने इशारा कर दिया था. प्रेमचंद्र ने कहा था कि “ यह किराये की
तालीम हमारे कैरेक्टर को तबाह किये डालती है. हमने तालीम को भी एक
व्यापार बना लिया है, व्यापार में ज्यादा पूंजी लगाओ, ज्यादा नफा होगा.
तालीम में भी ज्यादा खर्च करो, ज्यादा ऊचा ओहदा पाओगे. मैं चाहता हूँ की
ऊँची से ऊँची तालीम सबके लिए मुफ्त हो ताकि गरीब से गरीब आदमी भी ऊँची से
ऊँची लियाकत हासिल कर सके और ऊँचा ओहदा पा सके. यूनिवर्सिटी के दरवाजे
मैं सबके लिए खुले रखना चाहता हूँ. सारा खर्च गवर्मेंट पर पड़ना चाहिए,
मुल्क को तालीम की उससे कहीं ज्यादा जरूरत है जितनी फ़ौज की.”
ये बात सोलह आने सच है कि किसी भी देश का विकास उस देश की शिक्षा
प्रणाली पर निर्भर होता है, पर आज की शिक्षा प्रणाली में संस्कार नामक
चीज़ को दीमक लग गयी है. आज के शिक्षित युवा केवल शिक्षा लेकर ही बाहर
निकल रहे है. मानवीय गुणों को समझने की जिज्ञासा, संस्कार उनमे न के
बराबर हैं और शायद यही कारण है कि ऐसी घटनाएँ देश में प्रतिदिन प्रगति कर
रही है.
एक अच्छी शिक्षा के मूल में ज्ञान, संस्कार, मानवीय गुण, अच्छे आचरण का
भी प्रमुख स्थान है परन्तु बाजारीकरण के दौर से गुजरती शिक्षा व्यवस्था
के सामने यह सब चीज़े मात खा जाती है. शिक्षा का सीधा सा वास्तविक अर्थ
होता है कि मनुष्य कुछ सीखकर अपने को पूर्ण बना सके. इसी द्रष्टि से
शिक्षा को मानव जीवन की आँख भी कहा जाता है, वह आँख जो मनुष्य को उसके और
समाज के प्रति अच्छे और बुरे का रास्ता दिखा सके, पर आज की शिक्षा
प्रणाली का ही दोष है कि बैचलर और मास्टर डिग्रीहासिल कर लेने के बाद भी
जीवन व्यवहारों के नाम पर व्यक्ति शून्य है.
हर माता पिता की कोशिश रहती है कि उसके बच्चे अच्छी से अच्छी शिक्षा
हासिल कर ऊँचे से ऊँचे ओहदे पर पहुंचे पर ये सोचने वाली बात है की उन्ही
माँ बाप के साथ मारपीट, बुरा वर्ताव, गाली गलौज जैसी घटनाएँ दिन प्रतिदिन
बढती जा रही है. आधुनिकीकरण के इस दौर में भागदौड़ भरी जिन्दगी में हर
आदमी जल्द से जल्द वो स्थान हासिल कर लेना चाहता है, जिससे उसकी आगे की
जिन्दगी आसान बन सके और उस मुकाम को हासिल करने के लिए वो अपने माता पिता
को मारने पीटने से भी नही चूक रहा है. आज के इसी प्रकार के शिक्षित
व्यक्तियों की गाँव के बीस वर्ष पूर्व के अनपढ़ व्यक्तियों से अगर तुलना
करें तो हम ये देखेंगे कि वे एक दूसरे से प्यार करने वाले, सुख दुःख को
बाँटने वाले थे और अब ये शिक्षित होकर भी अधिक ईर्ष्यालु, स्वार्थी हो
गये हैं.
आज आप किसी शहर से दूसरे शहर के बीच अगर यात्रा करें और नजर दौडाएं तो आप
सबसे ज्यादा स्कूल, कॉलेज की बिल्डिंगो को सड़क किनारे खड़ा अथवा बनता हुआ
पाएंगे, ये प्राइवेट स्कूल आज के इस दौर में केवल शिक्षा की दुकाने मात्र
बनकर रह गये हैं. सभी में एक से बढ़कर एक फीस, सुविधाओं के नाम पर
स्वीमिंग पूल, एयर कंडिशनर तो मिल जायेंगे परन्तु मानवीय गुणों को समझाने
के लिए, घर परिवार के लिए आवश्यक संस्कारो के लिए कोई अतिरिक्त क्लास नही
मिलेगी. ये सभी चीज़े दर्शाती हैं की वर्तमान शिक्षा पद्धति बाजारीकरण की
भेंट चढ़ चुकी है. आज आप बस इन स्कूल की मासिक फीस भरते रहिये ये आपके
बच्चे का रिकार्ड बेहतर बताते रहेंगे. आज माँ बाप लोगो को एक बोझ लगने
लगे है, पश्चिमी देशों की तरह रहन सहन की चाहत में उनके माँ बाप रोड़ा बन
रहे है तभी इस तरीके के आपराधिक घटनाओं का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है.आज आप
किसी भी वृधाश्रम में चले जाएँ, ज्यादातर जगहों की स्थिति यही है कि वहां
अपनों के सताये लोगो के बच्चे अच्छी अच्छी कम्पनियों में काम कर रहे है
अथवा बिजनेस कर रहे हैं . सरकार को ध्यान देना होगा कि हमारी शिक्षा केवल
काम चलाऊ न हो बल्कि संसार, समाज के बीच रहना सिखाये. मानवतावादी बनाये.

शाहजहांपुर (उत्तर प्रदेश)
मो 7897211842

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