-राहुल लाल (कूटनीतिक मामलों के विशेषज्ञ)


उच्चतम न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक फैसले में असाध्य रोग से ग्रस्त व्यक्ति को इच्छामृत्यु का कानूनी अधिकार प्रदान कर दिया।सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ ने स्थापित कर दिया कि संविधान के अनुच्छेद-21 के अंतर्गत प्राप्त"जीवन के अधिकार" के साथ गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार भी समाहित है।न्यायालय ने कहा कि जीने की इच्छा नहीं रखने वाले व्यक्ति को निष्क्रिय अवस्था में शारीरिक पीड़ा सहने नहीं देना चाहिए।यह फैसला कानून और नैतिकता के बीच हुई कई वर्षों के कशमकश के बाद आया।सवाल था कि क्या उन बीमार मरीजों पर विचार किया जाए जिनकी चिकित्सा विज्ञान भी मदद नहीं कर सकता।यदि वे चाहें तो क्या मर सकते हैं?
सुप्रीम कोर्ट में प्रधान न्यायधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाले 5 सदस्यीय संविधान पीठ ने 'निष्क्रिय इच्छामृत्यु(पैसिव यूथेनेसिया)' और 'लिविंग बिल' को कुछ शर्तों के साथ अनुमति दे दी है।सुप्रीम कोर्ट ने अपने टिप्पणी में कहा कि मरन्नासन व्यक्ति को यह अधिकार होगा कि कब वह आखिरी सांस ले।उसने कहा कि कोई व्यक्ति 'लिविंग बिल' तैयार करके यह मांग कर सकता है कि अगर भविष्य में वह स्वस्थ्य से जुड़ी लाइलाज या मरन्नासन स्थिति में चला जाए,जिसमें तमाम आधुनिक इलाजों के बावजूद उबरना मुश्किल हो,उसको जीवनरक्षक प्रणाली से हटा दिया जाए।शीर्ष अदालत का यह फैसला कॉमन कॉज संस्था की एक याचिका पर आया है,जिसमें उसने लिविंग बिल को मान्यता दिए जाने को लेकर दिशानिर्देश जारी करने की मांग की थी।कॉमन कॉज नामक गैर सरकारी संगठन ने वर्ष 2005 में याचिका दायर की थी।संविधान पीठ ने 11 अक्टूबर 2017 को इस फैसला को सुरक्षित रखा था।
संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति ए के सीकरी,न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर, न्यायमूर्ति धनंजय वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति अशोक भूषण शामिल हैं।पीठ ने इस संदर्भ में कुछ दिशा निर्देश भी बनाएँ हैं,जिसमें कहा गया है कि कौन इच्छा मृत्यु का निष्पादन कर सकता है और किस तरह मेडिकल बोर्ड इसमें सहमति देगा।संविधान पीठ ने कहा है कि इस मामले में कानून बनने तक फैसले में उल्लेखित दिशानिर्देश प्रभावी रहेंगे।

सक्रिय और निष्क्रिय इच्छामृत्यु के बीच अंतर--
इच्छामृत्यु(यूथेनेसिया) के दो प्रकार हैं- पहला सक्रिय इच्छामृत्यु(एक्टिव यूथेनेसिया) और दूसरा निष्क्रिय इच्छामृत्यु(पेसिव यूथेनेसिया) है।इन दोनों में काफी अंतर है।किसी लाइलाज और पीड़ादायक बीमारी से जूझ रहे व्यक्ति को निष्क्रिय रूप से इच्छा मृत्यु दी जाएगी।इसका मतलब यह है कि पीड़ित व्यक्ति को जीवनरक्षक उपायों,जैसे -दवाई,डायलिसिस और वैंटिलेशन को बंद कर दिया जाए अथवा रोक दिया जाए।इसमें पीड़ित स्वयं को मृत्यु को प्राप्त होगा।दूसरी ओर एक्टिव यूथेनेसिया या सक्रिय इच्छामृत्यु वह है,जिसमें चिकित्सक पेशेवर,या कोई अन्य व्यक्ति कुछ जानबूझकर ऐसा करते हैं,जो मरीज के मरने का कारण बनता है।दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि एक्टिव यूथेनेसिया में इंजेक्शन या किसी अन्य माध्यम से पीड़ित को मृत्यु देना।सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेसिया की अनुमति दी है,एक्टिव की नहीं।सरल शब्दों में, सक्रिय और निष्क्रिय इच्छामृत्यु के बीच के अंतर को "मरने"और" हत्या"के बीच अंतर के रूप में भी देखा जा सकता है।

आखिर लिविंग बिल की प्रक्रिया क्या होगी?
लिविंग बिल को एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव भी कहते हैं,जिसमें व्यक्ति यह घोषणा करता है कि भविष्य में किसी ऐसी बीमारी से अगर वह ग्रस्त हो जाता है,जिसमें तमाम आधुनिक इलाजों के बावजूद उसका इलाज संभव न हो तो,उसका इलाज नहीं किया जाए।आस्ट्रेलिया में 'एडवांस डायरेक्टिव 'का प्रावधान लागू है।न्यायालय के अनुसार, जिस अस्पताल में मरीज भर्ती है,वहाँ मेडिकल बोर्ड का गठन होगा और अगर वह बोर्ड यूथेनेसिया से सहमत होगा तो रिपोर्ट कलेक्टर को भेजेगा।कलेक्टर मुख्य जिला मेडिकल ऑफिसर की अगुवाई में मेडिकल बोर्ड का गठन कर मरीज का परीक्षण करेगा।अगर जिला मेडिकल बोर्ड भी अस्पताल से सहमति रखेगा,तो मामले को फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट को रेफर कर देगा।अगर इस स्थिति में भी यूथेनेसिया की अनुमति नहीं मिलती है,तो मरीज के रिश्तेदार हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है।फिर हाई कोर्ट तीन डॉक्टरों का पैनल गठित कर मामला का परीक्षण करवाएगा और इसके बाद फैसला लिया जाएगा।
भारत में अरुणा शानबाग इच्छामृत्यु पर बहस का सबसे बड़ी चेहरा बनी,जिनकी 42 वर्ष तक निष्क्रिय रहने के बाद मई 2015 में मृत्यु हो गई।अरूणा शानबाग मुंबई के एक अस्पताल में नर्स थी।1973 में अस्पताल के ही एक सफाईकर्मी ने उनके साथ बलात्कार करने की कोशिश की।अरूणा द्वारा प्रतिरोध जताने के बाद उन्हें गंभीर चोटें आईं।उनका शरीर लकवाग्रस्त हो गया था।2009 में अरुणा शानबाग के जीवन को समाप्त करने के लिए एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई थी।सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने वर्ष 2011 में अरुणा शानबाग के मामले में सुनवाई करते हुए इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी,लेकिन इसके संबंध में कोई कानूनी प्रावधान नहीं होने के कारण स्थिति स्पष्ट नहीं हुई थी।ताजा फैसला से"मृत्यु के अधिकार"को भी संविधान के अनुच्छेद 21 में स्पष्टत:शामिल कर दिया गया,जो 'जीवन के अधिकार'से संबंधित है।

यूथेनेसिया की वैश्विक स्थिति---
ब्रिटेन समेत यूरोप के कई बड़े देश इच्छामृत्यु को आज भी हत्या मानते हैं।लेकिन नीदरलैंड, बेल्जियम, कोलंबिया और पश्चिम यूरोप के लग्जमबर्ग में इच्छा मृत्यु की अनुमति है।वर्ष 2015 में अमेरिका के कैलिफोर्निया ने भी वाशिंगटन, ओरेगन, मोंटाना और वेरमॉंट राज्यों की तरह इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी।सालों चली बहस के बाद 2016 में कनाडा ने भी इच्छामृत्यु की इजाजत दी थी।
नीदरलैंड में भी देखा जाता है कि मरीज की बीमारी असहनीय है कि नहीं और उसमें सुधार की संभावना है?बेल्जियम का कानून भी इससे मिलता जुलता है।अमेरिका और कनाडा में मरीज के इच्छामृत्यु के लिए मदद तभी मुहैया कराई जाती है,जब बीमारी असहनीय हो तथा इलाज संभव नहीं हो।

निष्कर्ष--
सवाल यह भी उठता है कि इच्छा मृत्यु की वसीयत क्या जायदाद की वसीयत की तरह होनी चाहिए,जिसमें लोग जितनी बार भी चाहे बदलाव कर सके।इसके अतिरिक्त मरीज के वसीयत के प्रमाणिकता पर भी सवाल उठ सकते हैं?क्या वसीयत में कोई यह भी घोषणा कर सकता है कि उसे कदापि इच्छामृत्यु नहीं चाहिए?भारत में जिस तरह मध्यवर्ग में बुजुर्गों को बोझ मानने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है,वैसे में इसके दुरुपयोग होने की प्रबल संभावना है।ऐसे में इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए पूर्ण सावधानी की आवश्यकता होगी।सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से भारतीय अस्पतालों में आईसीयू से अतिरिक्त दबाव के कम होने की संभावना जताई जा रही है।अंततः मरन्नासन पड़े या असहनीय दर्द झेल रहे लाइलाज बीमारियों से पीड़ित मरीजों को सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से लाभ मिलेगा,लेकिन इसके क्रियान्वयन पक्ष और नैतिक पक्ष पर बहस जारी रहेगी।

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