- सुरेन्द्र कुमार (स्वतंत्र लेखक व विचारक)


गत माह संपन्न हुई मोदी सरकार की कैबिनेट ने एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए 'बच्चों का लैंगिक उत्पीड़न संरक्षण अधिनियम' यानी पोस्को एक्ट में कड़ा संशोधन किया था। बैठक में निर्णय लिया गया कि जो मानवता का दुश्मन 12 या इससे कम उम्र की नन्ही कली के साथ दरिंदगी करेगा उसे सजा स्वरूप सजा-ए-मौत दी जाएगी। साथ ही 16 साल की कम उम्र की बिटिया के साथ हैवानियत करने वाले को अब न्यूनतम बीस साल के दंड के प्रावधान के साथ अपराधी की अग्रिम जमानत भी समाप्त कर दी। इतना ही नहीं केंद्र सरकार ने यह संशोधन भी किया कि यदि कोई हवस का भूखा दानव महिलाओं के साथ जोर जबर्दस्ती करता है तो ऐसे अपराधियों को दस वर्ष तक की सजा का कानून भी बनाया गया। पोस्को एक्ट में किए गए इन खास परिवर्तनों से हमें प्रथम दृष्टि यही लगता है कि राजनीति को सर्वोपरि मानने वाली हमारी व्यवस्था को इन निर्णयों को व्यावहारिक रूप देने में पहले पहल कुछ मुश्किलें हो सकती हैं परंतु वक्त के साथ ये निर्णय आम धारणा बन सकते हैं। अभी तक हमने यहाँ जघंय अपराधियों को बेखौप सरेआम घूमते हुए देखा है तथा पीड़ितों को अक्सर कोर्ट के चक्कर काटते काटते थकते हुए देखा है। यह हमारे देश की न्यायपालिका की विडम्बना ही है कि यहां संगीन अपराधों के पीड़ित न्यायालय के फैसले के इंतजार में या तो वे बूढ़े हो जाते हैं या फिर उनकी प्राकृतिक तौर पर सांस थम जाती है। ऐसे मामलों में देशवासियों ने अक्सर देखा है कि यहाँ फाइले वक्त के साथ धूल में सराबोर होकर सदा के लिए स्वतः ही बंद हो जाती हैं। परंतु बीते दिनों पोस्को एक्ट में सरकार के एक साहसिक कदम ने जनमानस में न्याय के प्रति आशा की किरण को सिंचने का भरपूर प्रयास किया है। मोदी सरकार के इस कल्याणकारी संशोधन का मूर्त रूप हमने पहली बार तब देखा जब मध्यप्रदेश के इंदौर में सत्र अदालत ने 3 माह 4 दिन की एक मासूम का अपहरण कर बलात्कार और निर्मम हत्या करने वाले विकृत मानसिकता से ग्रस्त दोषी अजय गडके को सजा स्वरूप सजा-ए-मौत मिली। इससे भी दिलचस्प बात यह रही कि यह फैसला वारदात के तेईस दिनों के अंदर ही सुनाया गया। 20 अप्रैल को इंदौर के राजबाड़ा इलाके में अपनी माँ के साथ सो रही मासूम को दरिंदे ने उठाया और मानवता को शर्मसार किया। अदालत ने मोदी सरकार के निर्णय के अनुरूप कृत्य का कड़ा संज्ञान लिया और मामले की सुनवाई प्रति दिन सात घंटे तक चलाई। इस प्रकार बीती 12 मई को हमें बलात्कार के मामले में पहली बार दंड के रूप में सजा-ए-मौत की प्रथम सुखद अनुभूति हुई। एक सामाजिक प्राणी होने के नाते मानव कभी भी किसी दूसरे प्राणी के मौत की कामना नहीं कर सकता। लेकिन जब समाज मे मानवीय दानवों का बोलबाला बढ़ने लगे तो प्रार्थनाएं सहज हो जाती है। सत्र अदालत ने कड़े शब्दों में कहा कि जो मासूम रोने के सिवा कुछ नहीं जानती उसके साथ दिल दहलाने वाला कृत्य पिशाची प्रवृत्ति का है। ऐसे विकृत मानसिकता वाले अमानवीय शख्स समाज के लिए गैगरीन रोग जैसे है। जिस प्रकार एक डॉक्टर गैगरीन प्रभावित भाग को शरीर से काटकर हटाता है उसी प्रकार ऐसे अपराधियों को मृत्युदंड देकर नहीं हटाया गया तो ये समाज के लिए बेहद घातक सिद्ध होंगे। यह कोर्ट का एक फैसला ही नहीं बल्कि एक आगाज है जिसे सरकार के एक निर्णय ने शक्ति प्रदान की है। मानवता के दूश्मनों को देश से बाहर खदेडने वाले इस संशोधन से देश की अन्य अदालतों को भी सीख लेनी होगी। देश में घटित कुकर्मों के अनेकों प्रतिफल ऐसे हैं जो हमारे समाज को पिछड़ेपन के गहरे गर्त की ओर निरंतर धकेल रहे हैं। आज हमें प्रतिदिन इन अमानवीय प्रवृत्ति के अपराधियों के डर की वजह से सुबह शाम अपनी बेटियों को विद्यालय छोड़ने व वापसी घर लाने जाना पड़ता है। जो हमारी विस्तृत विचारधारा को बारंबार झकझोरते हुए संकुचित मानसिकता में तब्दील कर रहा है। इंदौर कोर्ट से आए एक फैसले ने संपूर्ण भारतीयों में वह विश्वास जागृति किया जिसके लिए वे पिछले 70 वर्षों से तरस रहे थे। देशवासियों का विश्वास अधिक मजबूत तभी होगा जब भारत की सभी अदालतेें केंद्र सरकार के निर्णय के अनुरूप अपनी कर्तव्य निष्ठा दिखाएँ। अब समय आ गया है कि वे भी ऐसी घिनौनी वारदातों की सुनवाई दिन रात चलाए तथा तब तक चलाते रहे जब तक आरोपी फांसी के तख्ते पर न लटक जाए। यदि इंदौर में हुए इस सकारात्मक परिवर्तन की क्रियाशीलता देश के अन्य भागों में भी सुखद रही तो भारत में इसके अनेकों बेहतरीन परिणाम देखने को मिलेंगे। आज देश के उन माता पिताओं के कलेजे को भी ठंडक पहुँची होगी जिन्होंने अपनी बेटियों को विकृत मानसिकता से ग्रसित हैवानों की अमानवीय बढास का शिकार होते देखा है। मां बाप अपनी बेटियों की परवरिश बड़े अरमानों के साथ करता है तथा उसके लिए एक बड़ा सपना देखते हैं। लेकिन दरिंदों के एक दुस्साहस के समक्ष सब कुछ धराशायी हो जाता है। फलस्वरूप वे दुनियादारी से नफरत करने लगते हैं। हम आशा करते हैं कि जम्मू कश्मीर के कठुआ में 8 साल की आसिफा के साथ हुई अमानवीय घटना के कसूरवारों और उत्तर प्रदेश के एटा में 8 साल की नन्ही कली के साथ घटित हैवानियत के मामलों की सुनवाई भी यथासंभव शिघ्रता से हो ताकि घटना में संलिप्त असामाजिक तत्वों को जल्द सजा मिल सके। यदि ऐसा होता है तो इससे देश में पनपे दहशत के माहौल में कुछ गिरावट आवश्य आएगी। देश में बढती अपराधिक घटनाओं के ग्राफ के मध्य नजर हमें देश की जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली में भी माकूल परिवर्तन करने होंगे। सरकार मात्र निर्णय ले सकती है निर्णयों को व्यावहारिक रूप तो हमारे लोकतांत्रिक स्तंभों को ही देना होगा। इंदौर के सत्र न्यायालय ने जो किया उसकी जितनी सराहना की जाए कम है। परंतु वास्तव में मोदी सरकार की यह सोच तभी चरितार्थ होगी जब देश का आमजन अपने आप को यहाँ सुरक्षित महसूस करें। अतः भारत के विभिन्न न्यायालयों को इंदौर केस से सीख लेते हुए अपने यहाँ विचाराधीन घिनौनी घटनाओं को प्राथमिकता के तौर पर तब तक सुलझाना होगा जब तक कसूरवारो को सजा नहीं मिल जाती। यही मेरी मनोकामना है।


करसोग, हिमाचल प्रदेश। संपर्क 0981761209

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