-डा. आशा चैधरी,

’मेडम इंदौर से फोन है।’
किशोर कुमार के प्रिय खंडवा शहर में शहर के प्रसिद्ध एस एन काॅलेज में अपनी पोस्टिंग के दौरान एक रोज ईवनिंग शिफ्ट की परीक्षा ड्यूटी में आवश्यक कागजी कार्यवाही निबटा कर, गर्मा-गर्म लू के झोंके फेंक रहे सीलिंग फैन से थोड़ा हट कर बैठी ही थी मैं कि-
’इंदौर से फोन है आपका.....अर्जेंट।’ प्यून के इस वाक्य के दुहराकर कहने तक तो भरी गर्मी में भी ठंडे पसीने से पूरी तरह भीग सी चुकी थी मैं। इंदौर में, मेरे मायके में, तब थीं वहां मेरी विधवा मां, छोटी फुफेरी बहन अपने नवजात के साथ जिसका पति यानि मेरा बहनोई हाॅस्पिटल में एडमिट था अपनी दोनों किडनी खराब हो जाने के कारण। हे भगवान !
तब मोबाइल फोन आदि नहीं थे। काॅलेज का एकमात्र फोन प्रिंसिपल चेंबर में था, सो फोन वहीं अटैंड करना होता था।
कभी किसी नगर सेठ द्वारा दान की गई जोधा बाई के महलनुमा हवेली में लगने वाले अपने उस तत्कालीन काॅलेज की भूल-भुलैयां भरी अनगिनत सीढ़ियां बेतहाशा, बेसब्री से पार करती मैं जब प्रिंसीपल चेंबर तक पहुंची तब तक फोन कट चुका था।
’अभी निकलेंगी तो अंधेरा घिरने से पहले इंदौर पहुंच जाऐंगी आप। आपको अभी इसी वक्त परीक्षा ड्यूटी से मुक्त करता हूं।’
ये धीमी व शांत आवाज थी प्रिंसीपल संत साहब की जो वाकई किसी संत से कम न थे। उन्होंने इंदौर से आया मेरा फोन अटेंड कर लिया था।
’आपकी मदर ऐडमिट हैं। मगर ज्यादा चिंता की कोई बात नहीं है।’ वे अपनी संत वाणी में कह रहे थे मुझे आश्वस्त करने के लिये। मगर ऐसे में कहां, कैसी आश्वस्ति ? हृदय में न जाने कितनी, न जाने कैसी-कैसी तो आश्ंाकाऐं-कुश्ंाकाऐं धमा चैकड़ी मचा-मचा कर मुझे हलाकान किये जाती थीं।
तब हम इंदौर वासियों का एक बैग वीकेंड में घर जाने के लिये तैयार ही रहता था। घंटे आधे घंटे में खंडवा-इंदौर के बीच की दूरी को तीन-साढे़ तीन घंटे में नापतीं बसंे अनवरत दौड़ती रहती थीं। उन्हीं में से किसी एक बस में मैंने किसी तरह स्वयं को अपने उस छोटे से बैग सहित ठूंस ही दिया था।
इधर मैं इंदौर में अपने घर पहुंची कि उधर एक ऐंबुलेंस मेरे ही पीछे आ कर रूकी। अरे ! मम्मी थीं उसमें तो। मम्मी घर आ गईं थीं डिस्चार्ज हो कर। मेरी खुशी व इत्मीनान का ठिकाना न रहा। वे दिख भी स्वस्थ ही रहीं थीं। अच्छी मुस्कुराईं मुझे देख कर।
’क्या कर लिया था मम्मी ? कैसे ऐडमिट हो गईं थीं ?’
मैं पूछती थी उनसे बेसब्र सी, मगर उन्होंने बड़ी सरलता से मेरी पीठ थपथपा कर मुझे तसल्ली से भर दिया। उनके साथ आए परिजन में से एक ने मुझे किसी बहाने से वहां से अलग ले जा कर बताया कि ऐंजाइना और हार्ट अटैक की आश्ंाका के चलते उन्हें ऐडमिट किया गया था। मेरे पहुंचने तक सब ठीक-ठाक था, अधिक चिंता फिक्र की कोई बात न थी। लेकिन ़ ़ ़ मैने तो उन्हें कभी भी बिस्तर पर पड़े देखा नहीं तो इस कल्पना से भी मेरे होश उड़े जा रहे थे।
और ़ ़ ़ वह जो कुछ मेरी खबर खोजी मम्मी के साथ घटित हुआ था जिसके कारण उन्हें ऐडमिट करना पड गया, उस वाकये की ज्यों की त्यों बानगी, अवसर निकाल कर मुझे जब बताई गई तो यकीन करने या न करने की कोई वजह तब भी न थी मेरे पास, ना ही कोई ऐसी वजह आज है।
ये एक अंतहीन असमंजस आज तक जस का तस बना हुआ है अपनी जगह पर। मगर क्या घटित हुआ था मेरी अत्यंत साहसी मम्मी के साथ ? थोड़ा सब्र करना होगा।
चलिये, यहां से आरंभ करती हूं कि फुफेरी मगर हमारे ही घर में, मम्मी-पापा के आश्रय में पली-बढ़ी शीलू के लिये, उसके ब्याह के कोई चार साल पहले एक ऐसा रिश्ता आया था, जिसमें लड़का थोड़ा ठिगना और धुर सांवला होने की वजह से मेरी मम्मी ने परले सिरे से नापसंद कर दिया था। इसके अलावा, दोनों की कुंडलियां भी नहीं मिलती थीं।
कुछ तकदीर का खेल ऐसा रहा कि बरसों पहले कभी जर्मनी से भारत आ कर, संस्कृत व ज्योतिष पढ़ कर प्रकांड विद्वान के रूप में हमारे ही इंदौर शहर में बस चुके एक शख्स जो तब बाख पंडितजी के नाम से जाने जाते थे, इन्हीं बाख पंडिज्जी ने लड़के वालों के अनुरोध पर कुंडलियां देखीं और अपनी कैलकुलेशन के आधार पर घोषित कर दिया कि-
’कुंडलियां तो बड़ी खूब मिलती हैं भई मिलती हैं !’
बस् शादी हो गई किसी तरह। होनी को कौन रोक पाया है ?
इधर शादी हुई उधर पता चला कि लड़के वालों ने लड़के की किडनी खराबी की बात सरासर छुपाई थी। मगर तब क्या हो सकता था ? दामाद का इलाज जोर-शोर से तब शुरू हुआ कि जब इस दुनिया में उसका सफर खत्म होने को था। इन सारे प्रयासों का नतीजा सिफर ही तो निकलना था क्योंकि तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
यह शिकायत जब उन जर्मन पंडितजी के सामने लाई गई तो उनका बड़ा मासूमियत भरा जवाब था ’कुंडलियां तो शत-प्रतिशत मिलती हैं क्योंकि लड़के का अल्पायु योग था और लड़की की कुंडली में द्वि-विवाह योग था, मेरे अनुसार तो यह कुंडली मिलान सही था !’
यह एक यूरोपियन पंडित का कुंडली मिलान था या कि होनी का आसन्न करतब, जिसे तब शीलू भोगने जा रही थी। फूल सा नवजात उसकी गोद में था और पति के दिन गिने-चुने रह गए थे। उसे और मम्मी को यही बताया जा रहा था कि इलाज चल रहा है, वह जल्दी ही स्वस्थ हो कर लौट आएगा।
उन दिनों अपने अधबने मकान के सिलसिले में वे लोग वहीं पास में एक किराए का मकान ले कर रह रहे थे। तब, उन दिनों शीलू व बच्चे के पास कोई न था। अतः उन दोनों की देख-रेख के लिये मम्मी को कुछ दिन उसके पास रहना तय हुआ, इसी कारण वे उसके किराए के घर में थीं, कि जो उसकी रिश्ते की किसी जेठानी का था। वह जेठानी अपने पति की मृत्यु के बाद उसके स्थान पर उसी बैंक में क्लर्क थी। अपने दो बच्चों के साथ स्वयं अगले पोर्शन में रहते हुए उसने पीछे के पोर्शन को किराए पर दिया हुआ था। अब मम्मी इसी घर में शीलू के साथ थीं।
कुछ दिन तो सब ठीक ठाक चला। विधवा मकान मालिकिन के प्रति मम्मी की अगाध सहानुभूति व प्रेम का कोई ओर-छोर हो तभी तो कोई उसे नापे !
’देखो तो कैसे अपने बच्चों को अकेले के दम पे पाले ले रही है। पति का जरा जिकर भी कर दो तो झर-झर आंसू बहाने लगती है।’
’अरे मैं ये पूछूं हूं उस विधाता से कि इत्ते नालायक इस धरती पे बोझ बने घूमे हैं उनमें से कोई एक उठा लेता।’
’क्या जाता था तेरा ओ भगवान ? क्यों इत्ते दुख दिये बेचारी को। पर ़ ़ ़ रामजी की माया वे ही जानें। अरे करमदंड है सब करमदंड।’ कभी ये कहें तो कभी वो कहें। कभी ये डिश भिजवाऐं, तो कभी वो डिश भिजवाऐं मम्मी उसके यहां।
मगर अचानक ऐसा क्या हो गया था कि मम्मी तो उस बेचारी के इतना खिलाफ ही हो गईं कि जरा उसके पक्ष में कुछ भी सुनने को तैयार ही नहीं। उन्होंने तो जिद पकड़ ली थी कि दामाद जैसे ही घर आए ’छोड़ो ये मकान। यहां नहीं रहना !’
लेकिन क्यों ? क्यों ? आखिर कोई कारण तो हो !
’अच्छी औरत नहीं है तुम्हारी जिठानी!’......
’मम्मी किसीको ऐसे ही क्यों कुछ कह रही हो आप ? वो बेचारी बहुत ही अच्छी महिला है। परिवार मेें मेरा बहुत सपोर्ट करती है वह....’
’करती होगी। तुम्हें क्या पता। तुम तो सोई पड़ी रहती हो....!’
’हें।’
’रात को किसे, कब पिछले दरवाजे से अपने कमरे में बुलाती है ये मुझसे कहलवाना जरूरी ही था न ?’
’छि! मम्मी क्या कह रही हो आप ? ये हो ही नहीं सकता।’
’तुम तो सोई पड़ी रहती हो। जो मैने अपनी आंखों से देखा है वही कह रही हूं। न राई भर कम, ना रत्ती भर ज्यादा।’
मम्मी ने जब पुरजोर दावे के साथ कहा तो शीलू का कलेजा धक्क से रह गया था। इतना बड़ा इलजाम मम्मी किसी पर यूं ही नहीं लगा सकती थीं। बहुत सोच-विचार वाली, धर्म-प्रवण, ईश्वर को मानने-समझने वाली बेहद सुलझी हुई महिला थीं वे। किसी का भी आकलन वे केवल उसके चरित्र से ही करती थीं। खरा ही उनके मन-प्राण में, जीवन में भरा था सो खोटा क्षण मात्र में पहचान जाती थीं। नाहक ही किसी पर इल्जाम लगाने वाली महिलाओं में से नहीं थीं वे। वे कैसे गलत हो सकती थीं ? मगर ़ ़ ़
वो जेठानी भी वैसी तो नहीं ही थी जैसी मम्मी बता रहीं थीं। पति के गुजरने के बाद बैंक में उसे अनुकंपा नियुक्ति मिल गई थी जिसने उसके आर्थिक पक्ष को तो यथावत रखा था लेकिन भावनात्मक रूप से जो क्षति उसे हुई थी वह उससे उबर नहीं पा रही थी। बैंक मेनेजर व स्टाफ उसकी मनःस्थिति से अच्छी तरह परिचित था। आए दिन बैंक में उसकी अनुपस्थिति, लंबी छुट्टियों आदि को आपसी एडजस्टमेंट से सहन-वहन करते वे सब एक बहुत ही अच्छे संस्थान व वैसे ही सहकर्मी होने का बड़े धीरज के साथ परिचय दे रहे थे। औरों की तरह मम्मी से भी यह सब कुछ छुपा न था।
’कुदरत के लेख को कौन मेट सकता है ?’
’जिसका जित्ता साथ लिखा हो वो उत्ता ही साथ चलता है अपने।’
’वो जो भी करता है अपने भले के ही लिये करता है।’ जैसे तमाम जुमलों से वे उसे समझाया भी करती थीें लेकिन अब तो वे उसके यूं खिलाफ हो गईं थीं कि उधर देखने तक को तैयार नहीं। आखिर क्यों ऐसी, इतनी बड़ी न जाने कैसी गलतफहमी पाल ली थी उन्होंने ? ’गलतफहमी ना है ये। अपनी इन्हीं आंखों से देखा है सब।’
’क्या ़ ़ ़ आखिर क्या देखा है आपने ?’
’कुछ देखा होगा तभी तो बोल रही हूं।’ वे बताना ना चाहें, वो पूछने से बाज ना आए कि ़ ़ ़
’देखा तो देखा क्या ?’
’यही के रात के बारह बज के ठीक दस मिनट पे रोज चुपचाप एक लंबा-सांवला सा, मोटा सा, घुंघराले बालों वाला आदमी आवे है। उसके कमरे की सीढ़ियां चढ़ता मैने खुद देखा है उस मुटियल को।’ मम्मी दांत भींच कर बोलीं थीं। ऐसी घटिया बात कहने-बताने में भी उन्हें खासी उलझन हो रही थी।
’आप क्यों गईं इतनी रात को बाहर ? आपको जाना ही नहीं चाहिये था ़ ़ ़।’
’क्यों ना जाते ? बच्चे के कपड़े बाहर सूखते रह गए थे। उन्हें ही उठाने गई थी तब दिख गया। वो तो मेरे पास से निकलता हुआ सीधा सीढ़ियां चढ़ गया ससुरा। हें ? ऊपर जा के, पीछे मुड़ के मुझे देखता और था मरा ! न शर्म ना लिहाज, उल्टे घूर और रहा था ़ ़ ़ !’
’बस बस्। अब आगे से आप इतनी रात को बाहर नहीं निकलोगी। आने दो उसे आता है तो। होगा कोई। हमको क्या करना ?’
’क्यों ना निकलें ? अपनी तरफ आहट-आवाज होने से देखना तो पड़ता है के कोई चोर-उचक्का तो नहीं। और फिर अब इस बुढ़ापे में भला नींद आवे है ठीक से ? कहीं कोई कपडा़-लत्ता ना छूट गया हो बच्चे का, देखेंगे ही ना !’
तो बस् ! ऐसे ही अनेक बहाने ढूंढ लिये थे उन्होंने, रात को खटका होने पर ड्राइं्रगरूम का दरवाजा खोल बाहर, छोटे से उस खुले बराम्दे में भरी रात को निकल उस आदमी की छान-बीन करने के। उन्हें तो जैसे कोई धुन सी ही सवार हो गई थी। अध-सोई, अध-जागी सी पड़ी रहें। ठीक समय या उसके आस-पास बाहर खटका हो और वे धड़ाक से दरवाजा खोल कर कभी जानबूझ कर बाहर सूखता छोड़ दिया अपना कोई टाॅवेल, तो कभी बच्चे के कपड़े उठाने के बहाने से वहां जा पहुचें ़ ़ ़
और वह भी कित्ता ढीठ ! निरा बेशर्म कि जब मम्मी वहां जा डटें तो उन्हीं के ठीक सामने से खट-खट करता साथ लगी सीढ़ियां चढ़ टेरेस पर जा पहुंचे, वहीं ऊपर, जहां विधवा मकान मालिकिन का बेडरूम था। और तो और टेरेस पर पहुंच कर, वह अपनी छान-बीन करने के विशुद्ध इरादे से कभी कपड़े समेट रही तो कभी जबरदस्ती कपड़ों की तह लगाने-झटकने का स्वांग कर रही मम्मी को पीछे मुड़ कर भरपूर नजर से देखता हुआ टेरेस पर आगे बढ़ जाए, उस दरवाजे की ओर कि जो मकान मालिकिन के बेडरूम में खुलता था। इत्तनी गुस्ताखी ! मम्मी से तो कतई सही ना जा रही थी। उफ् ! दोनों कितने बेशर्म ! वह भी तो दरवाजा खोले बैठी रहती होगी न, तभी तो यह आता है।
मम्मी की रग-रग में नफरत, गुस्सा, हिकारत और इसी तरह का न जाने क्या-क्या आ समाया था उस विधवा मकान मालकिन के लिये।
’ओहो ! देखो तो मरा ऊपर जा के सीढ़ी पे खड़ा हो पलट के कैसा घूरे है मुझे ! आंखें देखी हैं मैने उसकी। बिल्कुल मरे कटड़े जैसी।’ उनका मन आता तो न जाने क्या-क्या वे कहा करतीं-बकतीं-झींकतीं, न जाने क्या-क्या वे सोचतीं।
अब, शीलू स्वयं जा कर सब कपड़े-लत्ते समेट लाती सांझ घिरते ही, लाख उन्हें समझाती, ताकीद करती कि वे रात को बाहर ना निकलें, शाम को ही सूखे कपड़े उठा लें, मगर ़ ़ ़मम्मी तो रात को जैसे ही बाहर कुछ वो उनका परिचित खटका होता वे तो सारी समझाइश परे फेंक मजनू की बुलाई लैला या फरहाद की बुलाई शीरीं सी स्वचालित सी वहां पहुंच जातीं। वहीं जहां से वह व्यक्ति अत्यंत सावधानी से मगर साधिकार उनके सामने से सीढ़ी चढ़ता हुआ टेरेस पर जाता होता। टेरेस पर पहुंच कर पीछे मुड़ कर हतप्रभ सी, काठ की काठ सी खड़ी मम्मी को पलट कर भर नजर देखता ़ ़ ़ और अगले ही पल अंधेरे में गुम हो जाता, उस दरवाजे की ओर कि जो मकान मालकिन के बेडरूम में खुलता था।
देखो तो हिम्मत, और बेशर्मी भी ! पूरे आठ-नौ दिना से जारी था वह खेल। जिसकी पूर्ण, खरी साक्षी थीं मम्मी। अब उनसे और ना सहा जाता था। ऐसे बेशर्मी भरे माहौल में रहने की वे जरा भी आदी न थीं।
’तुम्हारी काम वाली भी आ गई है अब। अब तो मुझे छुट्टी दो बेटा। मैं अब वापस जाऊँगी।’ उन्होंने तो रट लगा दी थी। अल्टीमेटम ही दे दिया था उस रोज।
’ठीक है मम्मी। जैसी आपकी मर्जी। आज ही राकेश और ब्रज भैया आने वाले हैं। आप चली जाना उनके साथ।’ शीलू को मानना ही पड़ा था तभी मम्मी ने चैन व तसल्ली की सांस स्वयं भी ली थी और उसे भी लेने दी थी।
मां का घर वहां से यही कोई पंद्रह-सोलह किलोमीटर की दूरी पर होता था। उस रोज मन ही मन जमाने की खोटी होती जा रही चाल को गरियाती-कोसती सी वे अपना बास्केट जमातीं, बीच-बीच में बच्चे के कुछ छोटे-मोटे काम भी निबटाती अपनी वापसी की तैयारी कर चुकी थीं।
तब, यही कोई दिन का डेढ़-दो बजा जाता था। तभी बारह-तेरह बरस की अर्नवा, वह बेहद सुंदर, बेहद प्यारी, अत्यंत ही मासूम बच्ची अर्नवा अपना बड़ा सा पारिवारिक एलबम ले कर आ पहुंची थी सबको दिखाने। राकेश व ब्रज आ चुके थे। उनका खाना-पीना सब हो चुका था। तब चाय के दूसरे दौर की तैयारी थी। मम्मी को हम बच्चे ’नशेड़ी’ की तर्ज पर ’चहेड़ी’ कहा करते थे। कोई भी वक्त उनके लिये चाय का वक्त होता था। अतः चाय के लिये पानी फिर से चढ़ा दिया गया था। मम्मी बड़े इतमीनान का प्रदर्शन करती सोफे पर आलती-पालथी मारे बैठ कर अपने बालों में कंघी कर रही थीं। वे कर तो रही थीं कंघी, पर ध्यान उनका कहीं और ही था। वे रह-रह कर अर्नवा की ओर देख लेती थीं ़ ़ ़
’ये छोटू है। तब उसका मुंडन हुआ था।’
’ये मैं हूं। ये मेरे मंुडन की फोटो है।’ अर्नवा एलबम में सजी तस्वीरों का विवरण देती जा रही थी। बड़ी ही प्यारी बच्ची थी अर्नवा। हाय !
’ये तब हम शिमला गए थे अंकल। ये रोहतांग पास में मैं बर्फ का गोला बना रही हूं। नानीजी देखिये ना ़ ़ ़’
’ये देखिये छोटू, ये मैं, ये मम्मी, ये भी मम्मी ़ ़ ़ ये मैं याक पर बैठी हूं। ये मम्मी हिमाचली ड्रेस में। ’
आलती-पालथी मारे बैठी मम्मी के थोड़ा अपोजिट ऐंगल से बैठी थी अर्नवा कि जहां से तस्वीरें उन्हें कुछ तिरछी दिख रहीं थीं। वे कभी देखतीं थीं तो कभी अनदेखा सा किये जातीं न जाने किस गुनताड़े से में थीं मन ही मन। निःसंदेह वे मकान मालकिन के ही खयालों से चैतरफा घिरी रही होंगी उस वक्त।
एलबम खोले बैठी अर्नवा तस्वीरें दिखाती, तस्वीरों के बारे में बताती जा रही थी। एकदम मम्मी की नजर में बिजली सी कौंध गई जब अर्नवा ने एलबम का एक पृष्ठ बिना कुछ कहे-बताए ही पलट दिया था।
अरे ! ये तो वही है वही दुष्ट। मरा ! रात को ऊपर के कमरे में जाने वाला। सांवला, मुटियल सा, घुंघराले बालों वाला। अच्छा ़ ़ ़ तो कोई रिश्ते-नाते में होगा इनके। तभी फोटो लगी हुई है एलबम में ससुरे की। उन्होंने बाकी सबकी नजर बचा कर शीलू को इशारा किया और अपनी तर्जनी अंगुली दिखाई कि यही है यही है वह !
’बेटा ये कौन है ?’
उन्हें सब्र कहां था ? वही अपनी तर्जनी उठा कर उस फोटो पर रख पूछ रहीं थीं वे बड़ी जासूस की तरह अर्नवा से। ’ये कौन बेटा ?’
’ये मैं हूं, जब पहली बार स्कूल गई थी तब की फोटो है यह।’
अर्नवा ने फिर से उस फोटो को पलट दिया था। वह अगले पृष्ठों को दिखाने लगी थी। मगर मम्मी ऐसे कहां मानने वाली थीं ? वे तो कंघी करना छोड़ बिजली की सी गति से उस एलबम को थाम पूछे जाती थीं ’बेटा ये कौन ?’
अर्नवा भरसक अनसुना सा करते हुए अगले पृष्ठ के फोटो दिखाते हुए कह रही थी-
’ये मम्मी हैं, यूनिवर्सिटी की डिग्री लेते हुए ़ ़ ़ ।’
’पर बेटा ये कौन ?’
अर्नवा बेचारी ने अनसुना कर तो दिया था मगर मेरी मम्मी को चैन कहां ? उन्होंने तो फिर से उसी पृष्ठ को उसके सामने कर दिया था। एकदम बेचैन सी हो पूछे जाती थीं अर्नवा से ़ ़ ़
’ये कौन बेटा ?
ये कौन ? ये, ये कौन है ? कौन ???
लो और कर लो पता !
अनमनी सी अर्नवा ने जब कुछ बुझे हुए से स्वर में जवाब दिया था तो ये ल्लो, मम्मी की तो सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई थी ?
क्यों ???
अर्नवा के मुख से इधर जवाब आया उधर एक सन्नाटा सा पसर गया था मम्मी व शीलू के दरमियान पल भर को। अर्नवा के जवाब पर पल दो पल मम्मी ने विस्फारित नैत्रों से देखा था उस फोटो में उसी शख्स को।
किसे ? और आखिर क्या देखा था उन्होंने उस फोटो में ?
वही ! ठीक वही मुटियाई सी काया, वही घुंघराले बाल, वही सीधी सतर दृष्टि ़ ़ ़ एक नही, दो नहीं पूरी आठ-नौ रातों सारा का सारा मंजर घूम गया था उनकी आंखों के सामने। पल-पल उनकी आंखों में पिछली बातें चलचित्र की तरह घूम गईं थीं। और ़ ़ ़घूम गया था उनका सिर। अपने घूमते, चक्कर खाते सिर को थामे वे स्वयं को सम्भालने की कितनी ही कोशिश क्यों न करतीं तो भी बेहोशी जैसा कुछ न कुछ तो मेरी साहसी व निडर मम्मी के साथ जरूर घटित होना ही था।
’क्या हुआ मम्मी को ? क्या हुआ ? क्या हुआ ?’ का शोर मच गया। जो राकेश व ब्रज भैया उन्हें घर ले जाने वाले थे वे ही उन्हें आनन-फानन हाॅस्पीटल ले गए।
मगर उन्हें हुआ क्या था ? शीलू सब जानती थी उनके साथ घटे पिछले घटना क्रम को। उसने डाॅक्टरों को बताया। ओ नो !
यानि मम्मी डर गईं थीं। डर के कारण उन्हें सदमा लगा था और उस सदमे व डर को माइल्ड अटैक की संभावना मानने से इंकार नहीं कर रहे थे डाॅक्टर ़ ़ ़।
’हें, मम्मी और डर ? जहां तक उनके जानने वाले व हम सब जानते थे कि वे डरती थीं तो मोटा-मोटी सिर्फ तीन चीजों से थीं ़ ़ ़ एक आकाश में गड़गड़ाती बिजली से थोड़ा सा। दूसरे, सांप से जरा ज्यादा। तीसरे, भूत से बहुत ज्यादा। फिर भी अपने डर व अवसाद आदि पर बड़ी जल्दी ही काबू कर लेने की देन से कुदरत ने उन्हें बड़े इफरात से नवाजा था और, उतने ही इफरात से उन्होंने उस देन से अपने बच्चों को भी नवाज दिया था।
सो, उधर एक तरफ मैं अपने भय व अवसाद पर काबू करती खंडवा से इंदौर के लिये रवाना हुई उधर, दूसरी तरफ मम्मी भी अपने भय व अवसाद की गिरफ्त से बाहर निकल होश में आने लगी थीं धीरे-धीरे। डाॅ ़शर्मा व उनकी टीम की कुशल देख-रेख मम्मी को हार्ट अटैक के खतरे से बाल-बाल बचा ले गई थी। कुछ समय के लिये उन्हें आॅब्जर्वेशन में रख कर डिस्चार्ज कर दिया गया था क्योंकि बड़ी जल्दी ही वे सहज हो चली थीं। अतः उन्हें डिस्चार्ज करा कर उनकी इच्छा के मुताबिक उनके अपने घर ले आए थे वे लोग। मगर डाॅक्टरों की सख्त हिदायत थी कि उन्हें जहां तक संभव हो वह घटना याद न दिलाई जाए। उन्हें ज्यादा अकेले न छोड़ें। किसी न किसी बहाने कोई न कोई उनके साथ बना रहे। उन्हें हंसी-खुशी रखें और बस् जहां तक हो सके उन्हें वह घटना याद न दिलाऐं !
मगर कौन सी घटना ?
कौन सी घटना ? क्या थी वह घटना आखिर ? मेरी सख्त जान मम्मी को जिसने बेहोश कर दिया था ? अवश्य ही उस घटना में खासा दम रहा होगा। वह घटना यही तो थी ना ़ ़ ़? कि,
एक लंबा-सांवला सा, मुटियाए बदन का, घुघराले बालों वाला एक व्यक्ति रोजाना रात के लगभग् बारह बज कर दस मिनट के आस-पास, बाहर बराम्दे में कपड़ों की उठाई-धराई व संभाल कर रही मम्मी के पास से गुजरता, सीढ़ियां चढ़ता, उनकी खोजी-पैनी दृष्टि पर अपनी सरसरी नजर फेंकता मकान मालकिन जो कि विधवा थी, के बेडरूम वाले टैरेस पर अंधेरे में गुम हो जाता था। इतना ही नहीं वह ऊपर टैरेस पर पहुंच कर नीचे अचरज व नफरत से भरी खड़ीं मम्मी को पलट कर घूर कर भी देखता था !
’तो इसमें डरने की क्या बात थी ? क्या वो मम्मी को कोई धमकी दे रहा था ? और ़ ़ ़ वो, अगर वो उसका कोई प्रेमी-व्रेमी न था तो आखिर था कौन ? मेरी तो समझ में कुछ न आता था। मम्मी ने उसे वहां आते देख लिया था। हो न हो वह इसी कारण उन्हें धमकाने की कोशिश कर रहा होगा।
’और करो किसीकी जासूसी। इतने दिनों से माताराम को मना कर रही थी मैं, मगर मम्मी मानने को कहां तैयार थीं ? अर्नवा की मम्मी के, बेचारी के पीछे ही पड़ गईं थीं।’ शीलू अपनी बड़-बड़ से बाज न आती थी।
’कैसी जासूसी ? किसकी जासूसी ? कोई मुझे कुछ बताएगा भी ? और आखिर डर की क्या बात थी मम्मी के लिये ? अर्नवा की मम्मी के पीछे क्यों बिला वजह पड़ने लगीं वे ? और आखिर कौन है ये अर्नवा ?’
’अर्नवा मकान मालकिन की बेटी है। आपको नहीं पता ?’
’अच्छा ठीक है, ठीक है। लेकिन वे क्यों पडेंगी उसकी मम्मी के पीछे ? जब उन्होंने कुछ देखा था तभी तो उन्हें शक हुआ होगा। और आखिर कौन जाता था अर्नवा की मम्मी के कमरे में इतनी रात गए ?’ ़ ़ ़ अब मेरी जिज्ञासा झल्लाहट में बदलने लगी थी। कुछ पता तो चले मुझे। कब तक पहेलियां बुझाते रहोगे तुम सब ?
’अर्नवा के पापा ! ़ ़ ़’
निपट सन्नाटे भरे पल अब मेरे और सबके बीच घिर आए थे। एक अजब-गजब सा, ठंडा सा, ठहरा-ठिठका हुआ सा सन्नाटा ़ ़ ़ जो असमंजस की शक्ल लेता मेरे दिल-दिमाग पर एक अजीब ही सी मूढ़ता की चादर डाले दे रहा था, जिसके कारण मेरी समझ काम न कर पा रही थी एकाएक ही। उस सन्नाटे का भेदते शब्द थे वे मेरे किन्हीं परिजनों में से किसीके, जो उस परिवार के बारे में सब कुछ जानते थे।
’हां । अर्नवा के पापा जाते थे।’
अर्नवा के पापा ? अर्नवा के पापा कहां से आ गए ? मेरे मनस पर चढ़ी असमंजस की धुंध छंटने को न आती थी। अर्नवा के पापा तो ़ ़ ़ ? ? ? अब कि जब दिमाग ने अपनी पूरी शक्ति से काम करना षुरू किया तो मेरे रोम-रोम में सिहरन सी समाने लगी थी। ़ ़ ़ क्यों ? क्योंकि ़ ़ ़ ़
यही कोई चार-पांच साल पहले, एक रात कि जब भारत पाकिस्तान के बीच कोई क्रिकेट मैच अपने पूरे क्लाईमैक्स पर था, तब, टी वी तब ऐंटेना से चला करते थे, उस रात को करीब बारह बजे का समय रहा होगा, इधर मैच पूरे क्लाईमैक्स पर आता था उधर टी वी स्क्रीन पर गड़बड़ शुरू ! बताते हैं कि क्रिकेट के दीवाने अर्नवा के पापा ऐंटेना एडजस्ट करने छत पर चढ़े और जल्दबाजी में छत की मुंडेर से फिसल कर जो गिरे तो, रीढ़ की हड्डी टूटने से गिरते ही सब खत्म ! वहीं, ठीक वहीं हुआ था वह हादसा कि जहां से मम्मी को कोई व्यक्ति सीढ़ियां चढ़ता दिखता था। मुझे झुरझुरी सी हो आई थी। मम्मी को अर्नवा के पापा के साथ वहां घटी उस दुघर्टना के बारे में वह सब कुछ पता न था। वे तो अनजाने ही, एक विधवा की निगरानी में माॅरल पुलिसिंग करतीं नाहक ही अपने प्राण सुखाऐ ले रही थीं।
उसी दुखद प्रसंग से बचने को अर्नवा ने अपने पापा की फोटो वाला पृष्ठ बिना कुछ बोले पलट दिया था। उसी फोटो को देख मम्मी का चैंकना स्वाभाविक था क्योंकि वे उसी व्यक्ति को इतने दिनों से, साधिकार, इतनी रात गए वहां आते देखती आईं थीं। उन्होंने तो कभी अर्नवा के पापा को देखा न था। अतः वे जो समझीं, उनकी जगह कोई और होता तो वह भी वही समझता कि विधवा मकान मालिकिन का कोई पे्रमी उससे मिलने आता होगा इतनी रात गए ़ ़ ़ ! बार बार फोटो पर अंगुली रख पूछती थीं वे अर्नवा से, बेटा ये कौन, ये कौन ?
’ये हमारे पापा !’
जब अर्नवा ने जवाब दिया था तो उसके उस जवाब को सुनने के साथ ही मम्मी को पिछला सारा घटनाक्रम, सारी उससे जुड़ी स्मृतियां उमड़-धुमड़ कर याद हो आईं थीं। माजरा समझते उन्हें देर न लगी थी। उनके हाथ से कंघी वहीं गिरी और वे अरर धम्म ! वहीं बेहोश हो सोफे से नीचे ढुलक गईं थीं।
बहरहाल, परिचितों का मानना है कि वे वहां भटक रहे थे।
आज तक यह रहस्य रहस्य ही है कि बावजूद इसके कि सारे कर्मकांड, विधि-विधान व दान-पुण्य अर्नवा के पापा के मोक्ष के निमित्त किये गए थे ़ ़ ़
वे तब तक क्यों भटक रहे थे ?
और क्यों वे मेरी मम्मी को ही दिखे ? और वो भी कोई एक बार नहीं पूरी आठ-नौ रातों तक। इस घटना के बाद या पहले वे किसी और को कभी दिखे हों ऐसा कभी किसीने नहीं बताया। ना ही उनके पत्नी-बच्चों ही ने कभी उन्हें देखा, महसूस किया।
या कि ़ ़ ़ अचानक ही किसी कारण से रात को वहां पहुंच गईं मेरी मम्मी की खोज-बीन वाली मानसिकता का वे यूं ही बस् मजा लेते, नीरस भूतैले जीवन में अपना थोड़ा मनोरंजन कर रहे थे इतने दिन ? यही है मेरा असमंजस, अभी तक जस का तस !

शा जे योगानंदम छत्तीसगढ़ महाविद्यालय,
रायपुर, छ ग।
मो : 7987798613, 895994611
asha.chaudhary100@gmail.com

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